कितना दुश्वार था दुनिया ये हुनर आना भी

कितना दुश्वार था दुनिया ये हुनर आना भी
तुझ से ही फ़ासला रखना तुझे अपनाना भी

कैसी आदाब-ए-नुमाइश ने लगाईं शर्तें
फूल होना ही नहीं फूल नज़र आना भी

दिल की बिगड़ी हुई आदत से ये उम्मीद न थी
भूल जाएगा ये इक दिन तिरा याद आना भी

जाने कब शहर के रिश्तों का बदल जाए मिज़ाज
इतना आसाँ तो नहीं लौट के घर आना भी

ऐसे रिश्ते का भरम रखना कोई खेल नहीं
तेरा होना भी नहीं और तिरा कहलाना भी

ख़ुद को पहचान के देखे तो ज़रा ये दरिया
भूल जाएगा समुंदर की तरफ़ जाना भी

जानने वालों की इस भीड़ से क्या होगा ‘वसीम’
इस में ये देखिए कोई मुझे पहचाना भी

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अक्स को मेरे कुछ अच्छा भी नहीं कर सकता

अक्स को मेरे कुछ अच्छा भी नहीं कर सकता,
आईना होके तू इतना भी नहीं कर सकता !

सर पे वो बोझ है जीने का कि मर जाना तो दूर,
मैं तो मरने का इरादा भी नहीं कर सकता l

जिस भंवर ने दी बुरे वक़्त की तालीम मुझे,
उस भंवर से मैं किनारा भी नहीं कर सकता l

कर न बैठूँ कहीं कुछ शिद्दत-ए-तन्हाई में,
खुद को अब और मैं तन्हा भी नहीं कर सकता l

जैसा होने के लिए मरती है दुनिया, मैं तो,
वैसा होने की तमन्ना भी नहीं कर सकता l

सामने अबके मिरे दोस्त नहीं, दुश्मन हैं,
दुश्मनो से तो मैं धोका भी नहीं कर सकता l

क्या सितम है कि मर्जी से कभी अपने में,
खुद को कम और ज़्यादा भी नहीं कर सकता l

राजेश रेड्डी

अपना ग़म लेके कहीं और न जाया जाये

अपना ग़म लेके कहीं और न जाया जाये
घर में बिखरी हुई चीज़ों को सजाया जाये

जिन चिराग़ों को हवाओं का कोई ख़ौफ़ नहीं
उन चिराग़ों को हवाओं से बचाया जाये

बाग में जाने के आदाब हुआ करते हैं
किसी तितली को न फूलों से उड़ाया जाये

ख़ुदकुशी करने की हिम्मत नहीं होती सब में
और कुछ दिन यूँ ही औरों को सताया जाये

घर से मस्जिद है बहुत दूर चलो यूँ कर लें
किसी रोते हुए बच्चे को हँसाया जाये

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बिछड़ा है जो एक बार तो मिलते नहीं देखा

बिछड़ा है जो एक बार तो मिलते नहीं देखा

बिछड़ा है जो एक बार तो मिलते नहीं देखा,
इस ज़ख़्म को हमने कभी सिलते नहीं देखा;

इस बार जिसे चाट गई धूप की ख़्वाहिश,
फिर शाख़ पे उस फूल को खिलते नहीं देखा;

यक-लख़्त गिरा है तो जड़ें तक निकल आईं,
जिस पेड़ को आँधी में भी हिलते नहीं देखा;

काँटों में घिरे फूल को चूम आयेगी तितली,
तितली के परों को कभी छिलते नहीं देखा;

किस तरह मेरी रूह हरी कर गया आख़िर,
वो ज़हर जिसे जिस्म में खिलते नहीं देखा।

हम अगर सच के उन्हें क़िस्से सुनाने लग जाएँ

हम अगर सच के उन्हें क़िस्से सुनाने लग जाएँ – शबाना यूसुफ़

हम अगर सच के उन्हें क़िस्से सुनाने लग जाएँ
लोग तो फिर हमें महफ़िल से उठाने लग जाएँ

याद भी आज नहीं ठीक तरह से जो शख़्स
हम उसे भूलना चाहें तो ज़माने लग जाएँ

शाम होते ही कोई ख़ुशबू दरीचा खोले
और फिर बीते हुए लम्हे सताने लग जाएँ

ख़ुद चराग़ों को अंधेरों की ज़रूरत है बहुत
रौशनी हो तो उन्हें लोग बुझाने लग जाएँ

इक यही सोच बिछड़ने नहीं देती तुझ से
हम तुझे बाद में फिर याद न आने लग जाएँ

एक मुद्दत से ये तन्हाई में जागे हुए लोग
ख़्वाब देखें तो नया शहर बसाने लग जाएँ

अब और क्या किसी से मरासिम बढ़ाएँ हम

अब और क्या किसी से मरासिम बढ़ाएँ हम
ये भी बहुत है तुझ को अगर भूल जाएँ हम

सहरा-ए-ज़िंदगी में कोई दूसरा न था
सुनते रहे हैं आप ही अपनी सदाएँ हम

इस ज़िंदगी में इतनी फ़राग़त किसे नसीब
इतना न याद आ कि तुझे भूल जाएँ हम

तू इतनी दिल-ज़दा तो न थी ऐ शब-ए-फ़िराक़
आ तेरे रास्ते में सितारे लुटाएँ हम

वो लोग अब कहाँ हैं जो कहते थे कल ‘
है है ख़ुदा-न-कर्दा तुझे भी रुलाएँ हम

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*मरासिम = रिश्ते = relations
* सहरा-ए-ज़िंदगी = जीवन का रेगिस्तान = desert of life
* फ़राग़त = आराम के लिए समय = time for rest
* दिल-ज़दा = दिल पीड़ित = heart afflicted
* शब-ए-फ़िराक़ = अलग होने की रात = the night of separation
* ख़ुदा-न-कर्दा = भगवान न करे = God forbid

दुख अपना अगर हमको बताना नहीं आता

दुख अपना अगर हमको बताना नहीं आता
तुम को भी तो अंदाज़ा लगाना नहीं आता

मैं भी उसे खोने का हुनर सीख ना पाया
उसको भी मुझे छोड़ के जाना नहीं आता

इस दौर-ए-सियासत में बड़े कैसे बनोगे
लोगों को जब आपस में लड़ाना नहीं आता

तारीख़ की आँखों में धुआं हो गए ख़ुद ही
तुम को तो कोई घर भी जलाना नहीं आता

पहुँचा है बुजुर्गों के बयानों से जो हम तक
क्या बात हुई, क्यूँ वो ज़माना नहीं आता

ढूंढें है तो पलकों पे चमकने के बहाने
आँसू को मेरी आँख में आना नहीं आता

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(तारीख़ = इतिहास)