अब और क्या किसी से मरासिम बढ़ाएँ हम

अब और क्या किसी से मरासिम बढ़ाएँ हम
ये भी बहुत है तुझ को अगर भूल जाएँ हम

सहरा-ए-ज़िंदगी में कोई दूसरा न था
सुनते रहे हैं आप ही अपनी सदाएँ हम

इस ज़िंदगी में इतनी फ़राग़त किसे नसीब
इतना न याद आ कि तुझे भूल जाएँ हम

तू इतनी दिल-ज़दा तो न थी ऐ शब-ए-फ़िराक़
आ तेरे रास्ते में सितारे लुटाएँ हम

वो लोग अब कहाँ हैं जो कहते थे कल ‘
है है ख़ुदा-न-कर्दा तुझे भी रुलाएँ हम

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*मरासिम = रिश्ते = relations
* सहरा-ए-ज़िंदगी = जीवन का रेगिस्तान = desert of life
* फ़राग़त = आराम के लिए समय = time for rest
* दिल-ज़दा = दिल पीड़ित = heart afflicted
* शब-ए-फ़िराक़ = अलग होने की रात = the night of separation
* ख़ुदा-न-कर्दा = भगवान न करे = God forbid

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दुख अपना अगर हमको बताना नहीं आता

दुख अपना अगर हमको बताना नहीं आता
तुम को भी तो अंदाज़ा लगाना नहीं आता

मैं भी उसे खोने का हुनर सीख ना पाया
उसको भी मुझे छोड़ के जाना नहीं आता

इस दौर-ए-सियासत में बड़े कैसे बनोगे
लोगों को जब आपस में लड़ाना नहीं आता

तारीख़ की आँखों में धुआं हो गए ख़ुद ही
तुम को तो कोई घर भी जलाना नहीं आता

पहुँचा है बुजुर्गों के बयानों से जो हम तक
क्या बात हुई, क्यूँ वो ज़माना नहीं आता

ढूंढें है तो पलकों पे चमकने के बहाने
आँसू को मेरी आँख में आना नहीं आता

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(तारीख़ = इतिहास)

क्या दुःख है, समंदर को बता भी नहीं सकता

क्या दुःख है, समंदर को बता भी नहीं सकता
आँसू की तरह आँख तक आ भी नहीं सकता

तू छोड़ रहा है, तो ख़ता इसमें तेरी क्या
हर शख्स मेरा साथ, निभा भी नहीं सकता

प्यासे रहे जाते हैं जमाने के सवालात
किसके लिए जिन्दा हूँ, बता भी नहीं सकता

घर ढूंढ रहे हैं मेरा , रातों के पुजारी
मैं हूँ कि चरागों को बुझा भी नहीं सकता

वैसे तो एक आँसू ही बहा के मुझे ले जाए
ऐसे कोई तूफ़ान हिला भी नहीं सकता

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अपने चेहरे से जो ज़ाहिर है छुपायें कैसे

अपने चेहरे से जो ज़ाहिर है छुपायें कैसे
तेरी मर्ज़ी के मुताबिक नज़र आयें कैसे

घर सजाने का तस्सवुर तो बहुत बाद का है
पहले ये तय हो कि इस घर को बचायें कैसे

क़हक़हा आँख का बरताव बदल देता है
हँसनेवाले तुझे आँसू नज़र आयें कैसे

कोई अपनी ही नज़र से तो हमें देखेगा
एक क़तरे को समुन्दर नज़र आयें कैसे

लाख तलवारें बढ़ी आती हों गर्दन की तरफ
सर झुकाना नहीं आता, तो झुकायें कैसे

फूल से रंग जुदा होना कोई खेल नहीं
अपनी मिटटी को कहीं छोड़ के जायें कैसे

जिसने दानिस्ता किया हो नज़रअंदाज़ ‘वसीम’
उसको कुछ याद दिलायें, तो दिलायें कैसे

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#तस्सवुर = कल्पना / imagination
#दानिस्ता = जान-बूझकर / intentionally

 

होंठों से छूलो तुम मेरा गीत अमर कर दो

 

होंठों से छूलो तुम मेरा गीत अमर कर दो
बन जाओ मीत मेरे मेरी प्रीत अमर कर दो

न उमर की सीमा हो न जनम का हो बंधन
जब प्यार करे कोई तो देखे केवल मन
नई रीत चलाकर तुम ये रीत अमर कर दो

जग ने छीना मुझसे मुझे जो भी लगा प्यारा
सब जीता किये मुझसे मैं हर दम ही हारा
तुम हार के दिल अपना मेरी जीत अमर कर दो

आकाश का सूनापन मेरे तनहा मन में
पायल छनकाती तुम आजाओ जीवन में
साँसें देकर अपनी संगीत अमर कर दो

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कोई ये कैसे बता ये के वो तन्हा क्यों है ?

कोई ये कैसे बता ये के वो तन्हा क्यों है ?
वो जो अपना था वोही और किसी का क्यों है ?
यही दुनिया है तो फिर ऐसी ये दुनिया क्यों है ?
यही होता हैं तो आखिर यही होता क्यों है ?

एक ज़रा हाथ बढ़ा, दे तो पकड़ले दामन
उसके सीने में समा जाये हमारी धड़कन
इतनी कुर्बत हैं तो फिर फ़ासला इतना क्यों है ?

दिल-ए-बरबाद से निकला नहीं अब तक कोई
एक लुटे घर पे दिया करता हैं दस्तक कोई
आस जो टूट गयी फिर से बंधाता क्यों है ?

तुम मसर्रत का कहो या इसे ग़म का रिश्ता
कहते हैं प्यार का रिश्ता हैं जनम का रिश्ता
हैं जनम का जो ये रिश्ता तो बदलता क्यों है ?

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