गीता हूँ कुरआन हूँ मैं

गीता हूँ कुरआन हूँ मैं
मुझको पढ़ इंसान हूँ मैं

ज़िन्दा हूँ सच बोल के भी
देख के ख़ुद हैरान हूँ मैं

इतनी मुश्किल दुनिया में
क्यूँ इतना आसान हूँ मैं

चेहरों के इस जंगल में
खोई हुई पहचान हूँ मैं

खूब हूँ वाकिफ़ दुनिया से
बस खुद से अनजान हूँ मैं

– राजेश रेड्डी

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प्यार पंछी, सोच पिंजरा दोनों अपने साथ हैं

प्यार पंछी, सोच पिंजरा दोनों अपने साथ हैं
एक सच्चा, एक झूठा, दोनों अपने साथ हैं

आसमाँ के साथ हमको ये जमीं भी चाहिए
भोर बिटिया, साँझ माता दोनों अपने साथ हैं

आग की दस्तार बाँधी, फूल की बारिश हुई
धूप पर्वत, शाम झरना, दोनों अपने साथ हैं

ये बदन की दुनियादारी और मेरा दरवेश दिल
झूठ माटी, साँच सोना, दोनों अपने साथ हैं

वो जवानी चार दिन की चाँदनी थी अब कहाँ
आज बचपन और बुढ़ापा दोनों अपने साथ हैं

मेरा और सूरज का रिश्ता बाप बेटे का सफ़र
चंदा मामा, गंगा मैया, दोनों अपने साथ हैं

जो मिला वो खो गया, जो खो गया वो मिल गया
आने वाला, जाने वाला, दोनों अपने साथ हैं
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शोला था जल-बुझा हूँ हवायें मुझे न दो

शोला था जल-बुझा हूँ हवायें मुझे न दो
मैं कब का जा चूका हूँ सदायें मुझे न दो

जो ज़हर पी चूका हूँ तुम्हीं ने मुझे दिया
अब तुम तो ज़िन्दगी की दुआयें मुझे न दो

ऐसा कभी न हो के पलटकर न आ सकूं
हर बार दूर जा के सदायें मुझे न दो

कब मुझ को एतराफ़-ए-मुहब्बत न था
कब मैंने ये कहा था सज़ायें मुझे न दो

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कस्मे रस्मे तोड के आजा देख दिसम्बर भाग रहा है

कस्मे रस्मे तोड के आजा देख दिसम्बर भाग रहा है,
भागा भागा दौड के आजा देख दिसम्बर भाग रहा है.

सच कहेती हुं बहेका दुंगी, आंखो से मय छलका दुंगी,
जाम सुराही फोड के आजा देख दिसम्बर भाग रहा है.

दिल से दिल तक ही जाना है हाथ पकड के साथ चलेंगे,
रस्ता मंझिल छोड के आजा देख दिसम्बर भाग रहा है.

एक नया आगाज़ लिखेंगे, एक नया उनवान रखेंगे,
पीला पन्ना मोड के आजा देख दिसम्बर भाग रहा है.

देवे उससे ज़्यादा पावे, इश्क न सौदा घाटेवाला,
सारी पूंजी जोड के आजा देख दिसम्बर भाग रहा है.

उल्टे सीधे सपने पाले बैठे हैं

उल्टे सीधे सपने पाले बैठे हैं
सब पानी में काँटा डाले बैठे हैं

इक बीमार वसीयत करने वाला है
रिश्ते नाते जीभ निकाले बैठे हैं

बस्ती का मामूल पे आना मुश्किल है
चौराहे पर वर्दी वाले बैठे हैं

धागे पर लटकी है इज़्ज़त लोगों की
सब अपनी दस्तार सँभाले बैठे हैं

साहब-ज़ादा पिछली रात से ग़ाएब है
घर के अंदर रिश्ते वाले बैठे हैं

आज शिकारी की झोली भर जाएगी
आज परिंदे गर्दन डाले बैठे हैं

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एक आँगन में दो आँगन हो जाते हैं !

एक आँगन में दो आँगन हो जाते हैं !
मत पूछा कर किस कारन हो जाते हैं !!

हुस्न की दौलत मत बाँटा कर लोगों में !
ऐसे वैसे लोग महाजन हो जाते हैं !!

ख़ुशहाली में सब होते हैं ऊँची ज़ात !
भूखे-नंगे लोग हरिजन हो जाते हैं !!

राम की बस्ती में जब दंगा होता है !
हिंदू- मुस्लिम सब रावन हो जाते हैं !!

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ख़ज़ाना कौन सा उस पार होगा

ख़ज़ाना कौन सा उस पार होगा
वहाँ भी रेत का अंबार होगा

ये सारे शहर में दहशत-सी क्यों हैं
यक़ीनन कल कोई त्योहार होगा

बदल जाएगी इस बच्चे की दुनिया
जब इसके सामने अख़बार होगा

उसे नाकामियाँ ख़ुद ढूँढ लेंगी
यहाँ जो साहिबे-किरदार होगा

समझ जाते हैं दरिया के मुसाफ़िर
जहाँ में हूँ वहाँ मँझधार होगा

ज़माने को बदलने का इरादा
तू अब भी मान ले बेकार होगा

– राजेश रेड्डी

अगर यक़ीं नहीं आता तो आज़माए मुझे

अगर यक़ीं नहीं आता तो आज़माए मुझे
वो आइना है तो फिर आइना दिखाए मुझे

अजब चराग़ हूँ दिन रात जलता रहता हूँ
मैं थक गया हूँ हवा से कहो बुझाए मुझे

मैं जिस की आँख का आँसू था उस ने क़द्र न की
बिखर गया हूँ तो अब रेत से उठाए मुझे

बहुत दिनों से मैं इन पत्थरों में पत्थर हूँ
कोई तो आए ज़रा देर को रुलाये मुझे

मैं चाहता हूँ कि तुम ही मुझे इजाज़त दो
तुम्हारी तरह से कोई गले लगाए मुझे

तुझे है मशक-ए-सितम का मलाल वैसे ही

तुझे है मशक-ए-सितम का मलाल वैसे ही,
हमारी जान थी, जान पर वबाल वैसे ही।

चला था ज़िकर ज़माने की बेवफाई का,
सो आ गया है तुम्हारा ख्याल वैसे ही।

हम आ गए हैं तह-ए-दाम तो नसीब अपना,
वरना उस ने तो फेंका था जाल वैसे ही।

मैं रोकना ही नहीं चाहता था वार उस का,
गिरी नहीं मेरे हाथों से ढाल वैसे ही।

मुझे भी शौक़ न था दास्ताँ सुनाने का,
मोहसिन उस ने भी पूछा था हाल वैसे ही।

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कल रात उस रिश्ते का पन्ना मोड आये है

कल रात उस रिश्ते का पन्ना मोड आये है,
ताज़ा गज़ल को युं अधूरा छोड आये है.

कोइ नही था उस शहर की भीड मे अपना,
आखिर बचाके जान अपनी दौड आये है.

आधा अधूरा सा अभी कच्चा खिलौना था,
रखना सलामत था उसे ही तोड आये है.

मेरी गली के बाद उस कोने मे वो घर था,
आंगन नही मिलते छतों को जोड आये है.

सौ सौ दफा सज़दे किये एक शख्स की खातिर,
थक हार के चौखट पे ये सर फोड आये है.