यूँ हसरतों के दाग़

यूँ हसरतों के दाग़ मुहब्बत में धो लिये
खुद दिल से दिल की बात कही और रो लिये

घर से चले थे हम तो खुशी की तलाश में
ग़म राह में खड़े थे वही साथ हो लिये

मुरझा चुका है फिर भी ये दिल फूल ही तो है
अब आप की ख़ुशी से काँटों में तोलिये

होंठों को सी चुके तो ज़माने ने ये कहा
ये चुप सी क्यों लगी है अजी कुछ तो बोलिये

गीतकार : राजेन्द्र कृष्ण
गायक : लता मंगेशकर
संगीतकार : मदन मोहन
चित्रपट : अदालत (1958)

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प्यार मुझसे जो किया तुमने तो क्या पाओगी

प्यार मुझसे जो किया तुमने तो क्या पाओगी
मेरे हालात की आँधी में, बिखर जाओगी

रंज और दर्द की बस्ती का मैं बाशिंदा हूँ
ये तो बस मैं हूँ के इस हाल में भी ज़िंदा हूँ
ख़्वाब क्यों देखूँ वो कल जिस पे मैं शरमिंदा हूँ
मैं जो शरमिंदा हुआ, तुम भी तो शरमाओगी

क्यों मेरे साथ कोई और परेशान रहे
मेरी दुनिया है जो वीरान तो वीरान रहे
ज़िन्दगी का ये सफ़र तुम पे तो आसान रहे
हमसफ़र मुझ को बनाओगी तो पछताओगी

एक मैं क्या अभी आएँगे दीवाने कितने
अभी गूँजेंगे मोहब्बत के तराने कितने
ज़िन्दगी तुमको सुनाएगी फ़साने कितने
क्यों समझती हो मुझे भूल नहीं पाओगी

चित्रपट:
संगीतकार:
गीतकार:  
गायक:

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होंठों से छूलो तुम मेरा गीत अमर कर दो

 

होंठों से छूलो तुम मेरा गीत अमर कर दो
बन जाओ मीत मेरे मेरी प्रीत अमर कर दो

न उमर की सीमा हो न जनम का हो बंधन
जब प्यार करे कोई तो देखे केवल मन
नई रीत चलाकर तुम ये रीत अमर कर दो

जग ने छीना मुझसे मुझे जो भी लगा प्यारा
सब जीता किये मुझसे मैं हर दम ही हारा
तुम हार के दिल अपना मेरी जीत अमर कर दो

आकाश का सूनापन मेरे तनहा मन में
पायल छनकाती तुम आजाओ जीवन में
साँसें देकर अपनी संगीत अमर कर दो

चित्रपट:
संगीतकार:
गीतकार:
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तेरी खुशबू और तेरी सांसें

तेरी खुशबू और तेरी सांसें क़तरा क़तरा सब भुलायेंगे
सिलवटें जो तुमने छोड़ी है धीरे-धीरे सब मिटायेंगे

काटने को इतनी लम्बी उम्र आगे है
जाने किसके पीछे तू बेवजह भागे है

आँख नम होती है होने दो होंठ लेकिन मुस्कुराएंगे
उसकी रातों से सुबह अपनी रफ्ता रफ्ता खींच लाएंगे

ऐसा कोई दिल नहीं जो कभी टूटा नहीं
कांच से उम्मीद क्या रखना

चल नयी शुरुआत कर  भूल के जो हो गया
हाथ पे यूँ हाथ क्या रखना

चित्रपट:
संगीतकार:
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गायक: ,

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कोई ये कैसे बता ये के वो तन्हा क्यों है ?

कोई ये कैसे बता ये के वो तन्हा क्यों है ?
वो जो अपना था वोही और किसी का क्यों है ?
यही दुनिया है तो फिर ऐसी ये दुनिया क्यों है ?
यही होता हैं तो आखिर यही होता क्यों है ?

एक ज़रा हाथ बढ़ा, दे तो पकड़ले दामन
उसके सीने में समा जाये हमारी धड़कन
इतनी कुर्बत हैं तो फिर फ़ासला इतना क्यों है ?

दिल-ए-बरबाद से निकला नहीं अब तक कोई
एक लुटे घर पे दिया करता हैं दस्तक कोई
आस जो टूट गयी फिर से बंधाता क्यों है ?

तुम मसर्रत का कहो या इसे ग़म का रिश्ता
कहते हैं प्यार का रिश्ता हैं जनम का रिश्ता
हैं जनम का जो ये रिश्ता तो बदलता क्यों है ?

गीतकार :
गायक :
संगीतकार :
चित्रपट :
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दो, पल रुका, ख्वाबों का कारवाँ

Do Pal Ruka - Veer Zaara

दो, पल रुका, ख्वाबों का कारवाँ
और फिर चल दिए, तुम कहाँ, हम कहाँ
दो पल की थी, ये दिलों की दास्ताँ
और फिर चल दिए, तुम कहाँ, हम कहाँ

तुम थे के थी कोई उजली किरण
तुम थे या कोई कली मुस्काई थी
तुम थे या था सपनो का था सावन
तुम थे के खुशियों की घटा छायी थी
तुम थे के था कोई फूल खिला
तुम थे या मिला था मुझे नया जहाँ

तुम थे या खुश्बू हवाओं में थी
तुम थे या रंग सारी दिशाओं में थे
तुम थे या रोशनी राहो में थी
तुम थे या गीत गूँजे फ़िज़ा में थे
तुम थे मिले या मिली थी मंज़िले
तुम थे के था जादू भरा कोई समा

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મિલનનાં દીપક સૌ બુઝાઈ ગયાં છે

મિલનનાં દીપક સૌ બુઝાઈ ગયાં છે,
વિરહનાં તિમિર પણ દહન થઈ ગયાં છે;
અભાગી નયન વાટ કોની જુએ છે,
હતાં સત્ય જે એ સ્વપન થઈ ગયાં છે.

અમારાં સ્વપનનું એ સદભાગ્ય ક્યાંથી?
સ્વપનમાં રહેલા સુખો થાય સાચા;
કે આ વાસ્તવીક જગનાં સાચાં સુખો પણ,
અમારા નસીબે સ્વપન થઈ ગયાં છે.

ઘણાએ દુ:ખો એ રીતે પણ મળ્યા છે,
કે જેને કદી જોઈ પણ ના શક્યો હું;
ઘણી એ વખત નીંદમાં સુઈ રહ્યો છું,
અને બંધ આંખે રૂદન થઈ ગયાં છે.

નથી મેળવાતી ખુશી સંપત્તીથી,
આ મોજાં રડીને કહે છે જગતને;
ભીતરમાં જ મોતી ભર્યાં છે છતાંયે,
સમુદ્રોનાં ખારા જીવન થઈ ગયાં છે.

પ્રણયમાં મેં પકડ્યા તમારા જે પાલવ,
પ્રણયની પછી પણ મને કામ આવ્યા;
પ્રસંગો ઉપરનાં એ પડદાં બન્યા છે,
ઉમંગો ઉપરનાં એ કફન થઈ ગયાં છે.

કવિ દિલ વીના પ્રકૃતિનાં સીતમને
બીજું કોણ ‘બેફામ’ સુંદર બનાવે?
મળ્યા દર્દ અમને જે એનાં તરફથી,
અમરા તરફથી કવન થઈ ગયાં છે.

– બરકત વીરાણી ‘બેફામ’

સ્વર –
સંગીત – 
ગુજરાતી ફિલ્મ –

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#તિમિર = अंधेरा, Darkness, અંધકાર